Peacelessness is the biggest problem in the world. Men are peaceless,countries are peaceless and societies are peaceless too. We are searching solutions but when apply a solution we see its limits.
Saints say that only surrender to God is the solution. We can surrender to God. But the concept of God is so tough to conceive that itself is a problem.
Then what should we do. We should follow the Truth. It will give us positively a peace a day. Here comes the question of patience. Don't worry. If you lose your patience and leave the path of Truth one day you will see the results of little follow up of your Truth. You will get a new faith in Truth after that.
Now your path is straight. Surprisingly you will see a day that Truth and God are the same one.
Thursday, March 29, 2012
Sunday, December 18, 2011
Sadhan-Path
साधन - पथ
स्वामी रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद की संसार को यह बहुत बड़ी देन है कि उन्होंने सभी धर्मों के मतभेद को समाप्त कर दिया. उन्होंने बताया कि किसी भी धर्मं की सच्ची साधना से भगवान की प्राप्ति की जा सकती है. इस विचार ने विश्व- प्रेम की दिशा में बहुत बड़ा काम किया और कर रहा है.
परन्तु इससे लोगों के मन में एक प्रश्न उत्पन्न हुआ कि जब सभी धर्मं एक ही बात बताते हैं तो फिर इतने धर्मं उत्पन्न क्यों हुए. इसका उत्तर स्वामी विवेकानंद ने यह दिया कि सभी धर्मं केवल बाह्य रूप में ही भेद रखते हैं, यह भेद देश- काल- परिस्थितियों के कारण उत्पन्न होता है और मूल रूप में इनमें कोई भेद नहीं है.
लेकिन श्री अरविन्द योग के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर दूसरी प्रकार से दिया जायेगा. श्री अरविन्द योग के अनुसार साधक यदि एक अन्य रूप में भगवान की अभिव्यक्ति चाहता है तब भी साधन-पथ में भिन्नता आ जाएगी. यहाँ यह स्पष्ट करना उचित होगा कि श्री अरविन्द योग का साधक यह तो हमेशा मानेगा कि उसका साधन पथ अन्य मार्गों से भिन्न है पर उसका अन्य साधन पथों से कोई बैर नहीं है. उसे ज्ञात रहता है कि अन्य पथ के लोग भगवान की अभिव्यक्ति अन्य रूपों में चाहते हैं तो हममें और उनमें भेद तो रहेगा ही.
एक प्रश्न और उठता है कि स्वामी विवेकानंद ने धर्मं शब्द प्रयोग किया है जबकि श्री अरविन्द ने साधन पथ और अध्यात्म पथ शब्द का प्रयोग किया है तो क्या श्री अरविन्द योग के साधक का अपने जन्म से प्राप्त धर्मं से सम्बन्ध छूट जाता है? तो इसका उत्तर यह है कि श्री अरविन्द ने अध्यात्म की अपेक्षा सम्पूर्ण धर्मं को ही बाह्य वस्तु माना है. इसलिए जगत के व्यवहार में तो धर्मं बना रहेगा परन्तु आध्यात्मिक और अतिमानसिक चेतना यह उद्घोषित करती रहेगी कि यह केवल व्यवहार ही है. समझदार साधक उसका नाम पूछने पर यह नहीं कहता कि वह तो एक आत्मा है, आत्मा का क्या नाम क्या रूप.
परन्तु अपने सच्चे स्वरुप को उद्घाटित करते हुए श्री माँ ने एक जगह कहा था - मैं किसी राष्ट्र की, किसी सभ्यता की, किसी समाज की, किसी जाति की नहीं हूँ, मैं भगवान की हूँ.
स्वामी रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद की संसार को यह बहुत बड़ी देन है कि उन्होंने सभी धर्मों के मतभेद को समाप्त कर दिया. उन्होंने बताया कि किसी भी धर्मं की सच्ची साधना से भगवान की प्राप्ति की जा सकती है. इस विचार ने विश्व- प्रेम की दिशा में बहुत बड़ा काम किया और कर रहा है.
परन्तु इससे लोगों के मन में एक प्रश्न उत्पन्न हुआ कि जब सभी धर्मं एक ही बात बताते हैं तो फिर इतने धर्मं उत्पन्न क्यों हुए. इसका उत्तर स्वामी विवेकानंद ने यह दिया कि सभी धर्मं केवल बाह्य रूप में ही भेद रखते हैं, यह भेद देश- काल- परिस्थितियों के कारण उत्पन्न होता है और मूल रूप में इनमें कोई भेद नहीं है.
लेकिन श्री अरविन्द योग के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर दूसरी प्रकार से दिया जायेगा. श्री अरविन्द योग के अनुसार साधक यदि एक अन्य रूप में भगवान की अभिव्यक्ति चाहता है तब भी साधन-पथ में भिन्नता आ जाएगी. यहाँ यह स्पष्ट करना उचित होगा कि श्री अरविन्द योग का साधक यह तो हमेशा मानेगा कि उसका साधन पथ अन्य मार्गों से भिन्न है पर उसका अन्य साधन पथों से कोई बैर नहीं है. उसे ज्ञात रहता है कि अन्य पथ के लोग भगवान की अभिव्यक्ति अन्य रूपों में चाहते हैं तो हममें और उनमें भेद तो रहेगा ही.
एक प्रश्न और उठता है कि स्वामी विवेकानंद ने धर्मं शब्द प्रयोग किया है जबकि श्री अरविन्द ने साधन पथ और अध्यात्म पथ शब्द का प्रयोग किया है तो क्या श्री अरविन्द योग के साधक का अपने जन्म से प्राप्त धर्मं से सम्बन्ध छूट जाता है? तो इसका उत्तर यह है कि श्री अरविन्द ने अध्यात्म की अपेक्षा सम्पूर्ण धर्मं को ही बाह्य वस्तु माना है. इसलिए जगत के व्यवहार में तो धर्मं बना रहेगा परन्तु आध्यात्मिक और अतिमानसिक चेतना यह उद्घोषित करती रहेगी कि यह केवल व्यवहार ही है. समझदार साधक उसका नाम पूछने पर यह नहीं कहता कि वह तो एक आत्मा है, आत्मा का क्या नाम क्या रूप.
परन्तु अपने सच्चे स्वरुप को उद्घाटित करते हुए श्री माँ ने एक जगह कहा था - मैं किसी राष्ट्र की, किसी सभ्यता की, किसी समाज की, किसी जाति की नहीं हूँ, मैं भगवान की हूँ.
Thursday, December 15, 2011
Satya aur Prem
ईश्वर की प्राप्ति सत्य या प्रेम किसी से भी की जा सकती है. पर साधन - काल में सत्य को पकड़ कर चलना ज्यादा ठीक रहता है. प्रेम हृदय की चीज है जबकि सत्य दिमाग की चीज है. प्रेम में जरा सी भी सतर्कता न बरती जाये तो यह भावुकता या आसक्ति में परवर्तित हो जाता है. जबकि सत्य को पकड़ कर चलने में ऐसा कोई खतरा नहीं होता. हाँ, कभी- कभी सत्य को पकड़ कर चलने वाला बहुत कठोर व्यवहार कर बैठता है. वह अपने आस- पास के सत्यहीन व्यक्तियों से मृदु व्यवहार नहीं कर पाता है. उसके लिए बस इतनी सलाह है कि वह ऐसे लोगों से मृदु व्यवहार न कर पाए तो न करे पर ज्यादा से ज्यादा मौन रहे .
कई बार ऐसा भी लगता है कि सत्यहीन व्यक्तियों पर क्रोध न किया जाये तो समाज में असत्यता बढती जाती है. पर समाज में असत्यता बढती है या घटती इस बात की परवाह नहीं करनी चाहिए. केवल अपने सत्यपालन पर ध्यान देना चाहिए. हाँ, यह बहुत बाद में ज्ञात होता है कि ऐसे सत्यपालक का प्रभाव बढता ही जाता है. पर वर्तमान में जगत में इतना झूठ भरा है कि इस बात को दिखने में समय लग जाता है.
कई बार ऐसा सत्यपालक खुद ही संशय में होता है कि उसका निर्णय सही है या गलत. पर इस बात की भी परवाह नहीं करनी चाहिए. बस उस समय में जो सबसे सही लगे वह करना चाहिए. माना गलत निर्णय हो गया तो उसके लिए पश्चाताप भी नहीं करना चाहिए. कई बार बाद में ऐसा महसूस होता है कि उस समय जिसको सही समझा था आज गलत लग रहा है. तो ठीक है अब आगे से हम वो करेंगे जो अब सही लग रहा है.
बहुत रहस्य कि बात है कि प्रेम के साधक को सत्य और सत्य के साधक को प्रेम प्राप्त हो जाता है. बात केवल प्रारंभ के समय की है. भावुकता या आसक्ति के कारण पतन न हो जाये इसलिए साधना सत्य को पकड़ कर प्रारंभ करनी चाहिए.
कई बार ऐसा भी लगता है कि सत्यहीन व्यक्तियों पर क्रोध न किया जाये तो समाज में असत्यता बढती जाती है. पर समाज में असत्यता बढती है या घटती इस बात की परवाह नहीं करनी चाहिए. केवल अपने सत्यपालन पर ध्यान देना चाहिए. हाँ, यह बहुत बाद में ज्ञात होता है कि ऐसे सत्यपालक का प्रभाव बढता ही जाता है. पर वर्तमान में जगत में इतना झूठ भरा है कि इस बात को दिखने में समय लग जाता है.
कई बार ऐसा सत्यपालक खुद ही संशय में होता है कि उसका निर्णय सही है या गलत. पर इस बात की भी परवाह नहीं करनी चाहिए. बस उस समय में जो सबसे सही लगे वह करना चाहिए. माना गलत निर्णय हो गया तो उसके लिए पश्चाताप भी नहीं करना चाहिए. कई बार बाद में ऐसा महसूस होता है कि उस समय जिसको सही समझा था आज गलत लग रहा है. तो ठीक है अब आगे से हम वो करेंगे जो अब सही लग रहा है.
बहुत रहस्य कि बात है कि प्रेम के साधक को सत्य और सत्य के साधक को प्रेम प्राप्त हो जाता है. बात केवल प्रारंभ के समय की है. भावुकता या आसक्ति के कारण पतन न हो जाये इसलिए साधना सत्य को पकड़ कर प्रारंभ करनी चाहिए.
Wednesday, September 28, 2011
Ishwar Ek Hai
ईश्वर एक है. पर वह अनंत रूपों में अपने को अभिव्यक्त करता है. इसलिए भ्रमवश व्यक्ति उसको अनेक मान लेते हैं. चूँकि प्रत्येक अभिव्यक्ति के दर्शन के लिए भिन्न - भिन्न मार्ग हैं इसलिए उसको पाने के मार्ग भी अनेक हैं. परन्तु चूँकि प्रत्येक मार्ग का लक्ष्य ईश्वर ही है, हमें अपने मार्ग पर चलते हुए भी अन्य मार्गों के प्रति सहिष्णु होना चाहिए.
जो यह जान जाता है कि वह एक ईश्वर अपने को अनंत रूपों में अभिव्यक्त कर सकता है और प्रत्येक अभिव्यक्ति के दर्शन के लिए एक अलग मार्ग है वह अपने मार्ग पर चलने के लिए अन्य व्यक्तियों को बाध्य नहीं करता. उसे तो ये अनेक मार्ग ऐसे लगते हैं जैसे कि एक बगीचे में विभिन्न प्रकार के फूल खिले हों. इन फूलों के विभिन्न रूपों और विभिन्न प्रकार की सुगंधों से वह बहुत प्रसन्नता का अनुभव करता है. एक समझदार भक्त समझता है कि केवल एक फूल के अस्तित्व से तो केवल एक रूप और केवल एक प्रकार की सुगंध ही प्राप्त होगी.
दूसरी बात यह है कि जहाँ दो होते हैं वहाँ प्रतिस्पर्धा कि संभावना बनी रहती है. ईश्वर भी दो होते तो वहाँ भी प्रतिस्पर्धा हो सकती थी. फूलों के उदाहरण में भी क्योंकि यह एक भौतिक उदाहरण है, हम फूलों के रूप या सुगंध के आधार पर उनको ऊपर- नीचे का दर्जा दे सकते हैं. परन्तु भगवान अपनी हर अभिव्यक्ति में पूर्णतयः समान होते हैं. हम अपनी मनुष्य- बुद्धि के कारण उनकी अभिव्यक्तियों में ऊपर- नीचे का भाव रखने की गलती कर सकते हैं.
जहाँ ईश्वर है वहाँ काल नहीं है. पर हम अपने समझने के लिए कहते हैं कि सृष्टि से पहले केवल एक ईश्वर था. तो क्या सृष्टि हो जाने पर दो वस्तुएं अस्तित्व में आ गयीं. नहीं ऐसा नहीं है. वह ईश्वर ही एक से अनेक हो गया है. यह अनेकता ही सृष्टि है .परन्तु समग्रता में देखने पर सृष्टि कुछ नहीं केवल ईश्वर ही है. वह ( ईश्वर ) अनेक होकर भी एक ही है. अनंत तक विस्तृत अनेक वही ( ईश्वर ) बना हुआ है. यही ज्ञान है. इसकी सिद्धि ही भगवत - प्राप्ति है.
जो यह जान जाता है कि वह एक ईश्वर अपने को अनंत रूपों में अभिव्यक्त कर सकता है और प्रत्येक अभिव्यक्ति के दर्शन के लिए एक अलग मार्ग है वह अपने मार्ग पर चलने के लिए अन्य व्यक्तियों को बाध्य नहीं करता. उसे तो ये अनेक मार्ग ऐसे लगते हैं जैसे कि एक बगीचे में विभिन्न प्रकार के फूल खिले हों. इन फूलों के विभिन्न रूपों और विभिन्न प्रकार की सुगंधों से वह बहुत प्रसन्नता का अनुभव करता है. एक समझदार भक्त समझता है कि केवल एक फूल के अस्तित्व से तो केवल एक रूप और केवल एक प्रकार की सुगंध ही प्राप्त होगी.
दूसरी बात यह है कि जहाँ दो होते हैं वहाँ प्रतिस्पर्धा कि संभावना बनी रहती है. ईश्वर भी दो होते तो वहाँ भी प्रतिस्पर्धा हो सकती थी. फूलों के उदाहरण में भी क्योंकि यह एक भौतिक उदाहरण है, हम फूलों के रूप या सुगंध के आधार पर उनको ऊपर- नीचे का दर्जा दे सकते हैं. परन्तु भगवान अपनी हर अभिव्यक्ति में पूर्णतयः समान होते हैं. हम अपनी मनुष्य- बुद्धि के कारण उनकी अभिव्यक्तियों में ऊपर- नीचे का भाव रखने की गलती कर सकते हैं.
जहाँ ईश्वर है वहाँ काल नहीं है. पर हम अपने समझने के लिए कहते हैं कि सृष्टि से पहले केवल एक ईश्वर था. तो क्या सृष्टि हो जाने पर दो वस्तुएं अस्तित्व में आ गयीं. नहीं ऐसा नहीं है. वह ईश्वर ही एक से अनेक हो गया है. यह अनेकता ही सृष्टि है .परन्तु समग्रता में देखने पर सृष्टि कुछ नहीं केवल ईश्वर ही है. वह ( ईश्वर ) अनेक होकर भी एक ही है. अनंत तक विस्तृत अनेक वही ( ईश्वर ) बना हुआ है. यही ज्ञान है. इसकी सिद्धि ही भगवत - प्राप्ति है.
Tuesday, September 27, 2011
Bhagwat Chetna se Sachetan Sahyog
भागवत चेतना से सचेतन सहयोग
भागवत चेतना निरंतर सबके विकास के लिए सक्रिय है. वह पत्थरों, पेड़- पौधों, पशुओं और मनुष्यों सभी में निरंतर विकास कर रही है. प्रश्न उठता है कि यदि पत्थर के विकास से पेड़ - पौधों के बीज बने तो जब पेड़ - पौधे अस्तित्व में आये तो पत्थरों का अस्तित्व समाप्त हो जाना चाहिए था. परन्तु ऐसा नहीं है. समष्टि विकास अपनी प्रक्रिया में व्यष्टि का अस्तित्व प्रकट करता है. और विकास दो रूपों में विभाजित हो जाता है.पत्थरों के समष्टि विकास से कुछ पत्थरों को व्यष्टि अस्तित्व प्रदान किया गया.यही प्रथमतः पेड़ - पौधों के मूल बीज बने. इसी प्रकार पेड़ - पौधों में भी कुछ विकसित व्यष्टियाँ प्रकट हुयीं. जिनसे पशुयों का अस्तित्व प्रकट हुआ. फिर पशुयों में भी विकास समष्टि रूप के साथ साथ कुछ विशिष्ट व्यष्टियाँ प्रदान करने का हुआ. और इससे मनुष्य जाति प्राप्त हुई. मनुष्य में भी इसी प्रकार विशिष्ट व्यष्टियाँ प्रकट हो रही हैं. ये विशिष्ट व्यष्टियाँ, वर्तमान सन्दर्भ में, विशिष्ट व्यक्ति भागवत चेतना के प्रति सचेत हो जाते हैं. ऐसे व्यक्ति भागवत चेतना हमें जिस अंतिम लक्ष्य की ओर ले जाना चाहती है उसमें सहयोग कर सकते हैं. यह सहयोग वे ह्रदय के शुद्ध प्रेम यानि भक्ति योग , भागवत ज्ञान के लिए जिज्ञासा यानि ज्ञान योग और अपनी कामनायों का अभाव करके भी कर्म करके यानि कर्म योग के द्वारा देते हैं. बाद में उनमें ये तीनो योग एक साथ उपलब्ध हो जाते हैं और वे भागवत चेतना को सहयोग देने में सचेतन यंत्र बन जाते हैं.
भागवत चेतना निरंतर सबके विकास के लिए सक्रिय है. वह पत्थरों, पेड़- पौधों, पशुओं और मनुष्यों सभी में निरंतर विकास कर रही है. प्रश्न उठता है कि यदि पत्थर के विकास से पेड़ - पौधों के बीज बने तो जब पेड़ - पौधे अस्तित्व में आये तो पत्थरों का अस्तित्व समाप्त हो जाना चाहिए था. परन्तु ऐसा नहीं है. समष्टि विकास अपनी प्रक्रिया में व्यष्टि का अस्तित्व प्रकट करता है. और विकास दो रूपों में विभाजित हो जाता है.पत्थरों के समष्टि विकास से कुछ पत्थरों को व्यष्टि अस्तित्व प्रदान किया गया.यही प्रथमतः पेड़ - पौधों के मूल बीज बने. इसी प्रकार पेड़ - पौधों में भी कुछ विकसित व्यष्टियाँ प्रकट हुयीं. जिनसे पशुयों का अस्तित्व प्रकट हुआ. फिर पशुयों में भी विकास समष्टि रूप के साथ साथ कुछ विशिष्ट व्यष्टियाँ प्रदान करने का हुआ. और इससे मनुष्य जाति प्राप्त हुई. मनुष्य में भी इसी प्रकार विशिष्ट व्यष्टियाँ प्रकट हो रही हैं. ये विशिष्ट व्यष्टियाँ, वर्तमान सन्दर्भ में, विशिष्ट व्यक्ति भागवत चेतना के प्रति सचेत हो जाते हैं. ऐसे व्यक्ति भागवत चेतना हमें जिस अंतिम लक्ष्य की ओर ले जाना चाहती है उसमें सहयोग कर सकते हैं. यह सहयोग वे ह्रदय के शुद्ध प्रेम यानि भक्ति योग , भागवत ज्ञान के लिए जिज्ञासा यानि ज्ञान योग और अपनी कामनायों का अभाव करके भी कर्म करके यानि कर्म योग के द्वारा देते हैं. बाद में उनमें ये तीनो योग एक साथ उपलब्ध हो जाते हैं और वे भागवत चेतना को सहयोग देने में सचेतन यंत्र बन जाते हैं.
Monday, September 26, 2011
Sri Arvind Society ki Sthapana
श्री अरविन्द सोसाइटी की स्थापना
श्री अरविन्द सोसाइटी की स्थापना क्या एक नए धर्मं या सम्प्रदाय की स्थापना है ? नहीं, ऐसा नहीं है.
सभी धर्मं और सम्प्रदाय भगवान तक पहुँचने के मार्ग हैं. जिसको इस बात पर विश्वास हो जाता है उसका किसी भी धर्मं या सम्प्रदाय से कोई भेद नहीं रह जाता. लेकिन जब किसी को लगता है कि केवल उसी का धर्मं या सम्प्रदाय भगवान तक पहुंचा सकता है तो मतभेद का प्रारंभ हो जाता है. हर व्यक्ति को अपना धर्मं या सम्प्रदाय प्यारा होता है और उसको उसके प्रेम और आस्था से हिलाने की जो भी कोशिश करता है उसको वह अपना शत्रु मानता है.
परन्तु ऐसा हर साधक के साथ होता है कि वह पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ अपने धर्मं या सम्प्रदाय की शिक्षायों का पालन करता है पर उसको लगता है कि उसको भगवान की प्राप्ति नहीं हो रही है.उस समय संसार में हमेशा महापुरुष, मसीहा, पैगम्बर, या अवतार जन्म लेते हैं. ये लोगों की भगवान की प्राप्ति में मदद करते हैं. इनके मन में संपूर्ण मानव जाति के लिए प्रेम भरा होता है. ये किसी की भी उसके धर्मं या सम्प्रदाय में श्रद्धा हिलाते नहीं हैं बल्कि उसकी श्रद्धा उसी के धर्मं या सम्प्रदाय में दृढ करते हैं. हाँ, अपने काम को सम्पादित करने के लिए ये किसी समिति या समाज की स्थापना कर सकते हैं. पर यह किसी नए धर्मं या सम्प्रदाय की स्थापना नहीं होती. उनके शिष्यों और अनुगामियों का भी यह कर्त्तव्य होता है कि समस्त मानव जाति को भगवान की प्राप्ति की ओर बढाएं.
इसी उद्देश्य से श्री अरविन्द सोसाइटी की स्थापना हुई है. श्री अरविन्द सोसाइटी दुनिया भर के समस्त धर्मों और सम्प्रदायों के अनुगामियों को भगवान की प्राप्ति के मार्ग पर मदद करने के लिए है न कि एक नया धर्मं या सम्प्रदाय खड़ा करने के लिए.
श्री अरविन्द सोसाइटी की स्थापना क्या एक नए धर्मं या सम्प्रदाय की स्थापना है ? नहीं, ऐसा नहीं है.
सभी धर्मं और सम्प्रदाय भगवान तक पहुँचने के मार्ग हैं. जिसको इस बात पर विश्वास हो जाता है उसका किसी भी धर्मं या सम्प्रदाय से कोई भेद नहीं रह जाता. लेकिन जब किसी को लगता है कि केवल उसी का धर्मं या सम्प्रदाय भगवान तक पहुंचा सकता है तो मतभेद का प्रारंभ हो जाता है. हर व्यक्ति को अपना धर्मं या सम्प्रदाय प्यारा होता है और उसको उसके प्रेम और आस्था से हिलाने की जो भी कोशिश करता है उसको वह अपना शत्रु मानता है.
परन्तु ऐसा हर साधक के साथ होता है कि वह पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ अपने धर्मं या सम्प्रदाय की शिक्षायों का पालन करता है पर उसको लगता है कि उसको भगवान की प्राप्ति नहीं हो रही है.उस समय संसार में हमेशा महापुरुष, मसीहा, पैगम्बर, या अवतार जन्म लेते हैं. ये लोगों की भगवान की प्राप्ति में मदद करते हैं. इनके मन में संपूर्ण मानव जाति के लिए प्रेम भरा होता है. ये किसी की भी उसके धर्मं या सम्प्रदाय में श्रद्धा हिलाते नहीं हैं बल्कि उसकी श्रद्धा उसी के धर्मं या सम्प्रदाय में दृढ करते हैं. हाँ, अपने काम को सम्पादित करने के लिए ये किसी समिति या समाज की स्थापना कर सकते हैं. पर यह किसी नए धर्मं या सम्प्रदाय की स्थापना नहीं होती. उनके शिष्यों और अनुगामियों का भी यह कर्त्तव्य होता है कि समस्त मानव जाति को भगवान की प्राप्ति की ओर बढाएं.
इसी उद्देश्य से श्री अरविन्द सोसाइटी की स्थापना हुई है. श्री अरविन्द सोसाइटी दुनिया भर के समस्त धर्मों और सम्प्रदायों के अनुगामियों को भगवान की प्राप्ति के मार्ग पर मदद करने के लिए है न कि एक नया धर्मं या सम्प्रदाय खड़ा करने के लिए.
Friday, March 25, 2011
Good and Bad
Good and Bad
When we aquire some thinking power first thing which we get from our parents is that this is good and that is bad. We have a simple faith in our childhood so we believe on whatever they teach. But when we aquire some more understanding we feel their so called good and bad are not exactly good and bad for us. Then some persons come forward and tell us some more modified good and bad. It may help us for some more time. But we see the end is again futile.
Then we meet some other persons who tell us that we have to search our good and bad ourselves. But after some time the result is the same. And then we make a resolution that nothing is good or bad. And we start our all activities under this dictum. But now we are facing a good resistance from society. Now all our individuality is shattered,all our personality is broken. Sometimes we feel a great hate for the society but at once a fear complex or a cowardice or a helpless condition.
It is the condition of about 99 percent people. All our freedom has been snatched by the society, we feel.
Is there any solution for this Problem. Yes, we have a solution. Go very inside your heart. There you will see your soul. It will tell you the real good and bad. It will inspire you to follow the Good and it will give you such a strength that even whole of the world is against your good you will follow your good, you will go forward on your good.
When we aquire some thinking power first thing which we get from our parents is that this is good and that is bad. We have a simple faith in our childhood so we believe on whatever they teach. But when we aquire some more understanding we feel their so called good and bad are not exactly good and bad for us. Then some persons come forward and tell us some more modified good and bad. It may help us for some more time. But we see the end is again futile.
Then we meet some other persons who tell us that we have to search our good and bad ourselves. But after some time the result is the same. And then we make a resolution that nothing is good or bad. And we start our all activities under this dictum. But now we are facing a good resistance from society. Now all our individuality is shattered,all our personality is broken. Sometimes we feel a great hate for the society but at once a fear complex or a cowardice or a helpless condition.
It is the condition of about 99 percent people. All our freedom has been snatched by the society, we feel.
Is there any solution for this Problem. Yes, we have a solution. Go very inside your heart. There you will see your soul. It will tell you the real good and bad. It will inspire you to follow the Good and it will give you such a strength that even whole of the world is against your good you will follow your good, you will go forward on your good.
Subscribe to:
Posts (Atom)